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अधिकारियों न माना, गिर रहा है शिक्षा का स्तर

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कोलकाताः इतने दिनों तक स्कूल स्तर के समस्त व्यर्थताआें की जिम्मेदारी सरकार अथवा छात्रों पर शिक्षाजगत मढ़ देता था. हाल में हुई एक समीक्षा में जिस प्रकार शिक्षकों के एक बड़े हिस्से को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है.

इस समीक्षा से शिक्षक भी चिंतित है. इस विषय पर किसी ने सफाई दी तो कोई सरकार के खिलाफ आरोप लगाया है. अतिरिक्त कार्य करने के काऱण ही पढ़ाने के कार्य में मन कम दियाजा रहा है.

यह परोक्ष रुप से कईयों ने माना भी है. इसी प्रकार पाठ्यक्रम को शिक्षकों ने अवैज्ञानिक करार दिया. सरकारी, सरकार पोषित व सरकार के सहायता प्राप्त स्कूलों में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर पर पठन पाठन की खामियों को खोजने के लिए स्टेट काउंसिल आफ एडूकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एससीईआरटी) ने प्रयास किया. उस समीक्षा में राज्य के अधिकांश छात्रों की दयनीय दशा उजागर हुई है.

उसके लिए विभिन्न कारणों के साथ शिक्षकों की लापरवाही का मामला भी सामने आया है. समीक्षा में कहा गया है कि शिक्षक केवल किताब देख कर पढ़ते जाते हैं. छात्रों ने समझा या नहीं शिक्षक इस बारे में विचार ही नहीं करते.

निखिलबंद शिक्षक समिति के महासचिव कृष्ण प्रसाद भट्टाचार्य ने कहा कि जितना भी दोष है वह शिक्षकों का है. छह वर्षों से स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई.

अवैज्ञानिक पाठ्यक्रम से छात्रों में कहां से विकास होगा.शिक्षक हलकों का कहना है कि शिक्षकों पर दोष न देकर पाठ्यक्रमों का विकास करने की आवश्यकता है. प्रधानाशिक्षक प्रशासनिक कार्य करने के चक्कर में अधिकारी बन गये हैं.

कई जिलों में पाठ्य पुस्तक पहुंचने में ही कई महीने लग जाते हैं. हालांकि बंगीय शिक्षक व शिक्षाकर्मि समिति के महासचिव स्वपन मंडल ने कहा कि समय के साथ शिक्षकों की मानसिकता का परिवर्तन करना होगा. शिक्षक के कार्यों में जिम्मेदारी जरुरी है. स्कूल शिक्षा कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा कि पाठ्यक्रम में काफी संख्या में वैज्ञानिक एवं केंद्रीय समीक्षा में तृतीय व पांचवी स्तर पर इस राज्य का अनुपात काफी अच्छा है. इससे यह सिद्ध होता है कि पाठ्यक्रम एकतरफा अवैज्ञानिक नहीं है. 

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