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असम के बाद बंगाल में घुसपैठियों में दहशत

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कोलकाता। असम में जनसंख्या की नई सूची से 40 लाख बांग्लादेशियों को नागरिकता से बेदखल किए जाने के बाद पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में बसे घुसपैठियों में दहशत का माहौल बन गया है। राज्य में जिस तरह से लोगों का झुकाव सत्तारूढ़ तृणमूल की ओर से भाजपा की ओर हुआ है, उसे देखते हुए यह डर और अधिक बढ़ गया है।  

भाजपा की ओर से साफ कर दिया गया है कि बंगाल में सत्ता पर काबिज होने के बाद यहां भी जनसंख्या की नई सूची जारी की जाएगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने साफ किया है कि राज्य में भाजपा की सरकार आने के बाद यहां बसे करीब एक करोड़ बांग्लादेशियों को खदेड़ा जाएगा।

इसके बाद कूचबिहार, मालदह, अलीपुरदुआर आदि जिलों में सीमा पर बसे हजारों अल्पसंख्यक परिवारों में डर का माहौल व्याप्त हो गया है। कूचबिहार में कई ऐसे परिवार हैं जो सीमा पार कर आए हैं और दैनिक मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं। इन लोगों के पास आधार कार्ड तो नहीं है लेकिन राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र है। 

छह साल की उम्र में सीमा पार से अलीपुरदुआर पहुंची तबस्सुम बेगम के आज तीन बच्चे हैं और उनके भी बच्चे हो चुके है। उन्होंने बताया कि असम मामले के बाद इन लोगों के मन में भी डर का माहौल व्याप्त हो गया है। अगर पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू होता है और अगर किसी भी तरह से उनका नाम अगर नागरिकता सूची से बाहर कर दिया जाता है तो उनके पास जाने के लिए दूसरा कोई ठिकाना नहीं है।  

तौसीफ मोल्ला नाम के एक वृद्ध ने बताया कि 40 साल पहले सीमा पार से पश्चिम बंगाल पहुंचे थे। यहां विभिन्न जगहों पर दैनिक मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं।

राशन कार्ड बन चुका है लेकिन स्थाई नागरिकता अभी भी नहीं मिली है। उन्हें डर है कि अगर पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू होता है तो कहीं उन्हें भी शरणार्थी बनकर समय गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। 
सलमा खातून के चार बच्चे हैं जो मालदा जिले के मदरसों में पढ़ते हैं।

उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू करना यहां लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ अन्याय होगा। उन्होंने कहा कि हम लोग अब इसी देश के हो गए हैं। यहीं रहना है और यही मर जाना है। असम मामले के बाद बच्चों के भविष्य को लेकर वह भी संकित हैं।

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