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कौन हैं ये नागा साधु, कहां से आते हैं?

जयपुर। कुंभ मेले में स्नान करने के लिए पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में कुंभ मेले में सबके आकर्षण का केंद्र माने जाते हैं नागा साधु। नागा साधु कहा से आते हैं व कहां जाते हैं इस बारे नें कोई नहीं जानता। नागा साधु अर्धकुंभ, महाकुंभ में निर्वस्त्र रहकर हुंकार भरते हैं, शरीर पर भभूत लपेटते हैं, नाचते गाते हैं, डमरू ढपली बजाते हैं आज इस लेख में नागा साधु की रहस्यमय जीवन के रहस्य के बारे मे बता रहे हैं।

नागा साधू कहां से आते हैं और कुंभ के पूरा होने के बाद कहां जाते हैं, इसको लेकर लोगो को मन में हमेशा जिज्ञासा रहती है क्योंकि इस बारे मे कोई नहीं जानता। नागा साधुओं कुंभ के मेले में बडी संख्या में आते हैं। इससे बडी बात कुंभ मेले बड़ी संख्या में आने वाले साधु के आने और जाने के बारे में शायद ही किसी को पता चलता है। इससे साथ ही ऐसा माना जाता है कि नागा साधु कभी भी आम रास्ते से नहीं आते, बल्कि देर रात घने जंगल से अपनी यात्रा करते हैं।

नागा साधु तप-साधना में हमेशा लीन रहते हैं नागा साधु का जीवन काफी कठिन होता हैं। संतों के 13 अखाड़ों में से सिर्फ सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं। इनमें जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा शामिल हैं।

नागा साधुओं को दीक्षा के बाद उनकी वरीयता के आधार पर पद दिए जाते हैं। जैसे – कोतवाल, बड़ा कोतवाल, महंत, सचिव आदि। नागा साधुओं के अखाड़े से जुड़ा कोतवाल अखाड़े और नागा साधुओं के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं।जंगल में रहने वाले नागा साधुओं को कुंभ में बुलाने का काम इसके साथ ही इनको सूचना पहुंचाने का काम, नागा कोतवाल करते हैं।

नागा साधु अपना श्रृंगार भभूत, रुद्राक्ष, कुंडल आदि से करते हैं नागा साधु अपने साथ त्रिशूल, डमरू, तलवार, चिमटा, चिलम रखते हैं। नागा साधु कभी भी एक स्थान पर नहीं रहते नागा साधु हमेशा पैदल ही भ्रमण करते हैं।नागा साधु तमाम तरह की यौगिक क्रियाएं करते हैं। शैव परंपरा से जुड़े नागा साधु ध्यान-साधना के अलावा अपने गुरु की विशेष रूप से सेवा करते हैं। नागा साधुओं को शंकराचार्य की सेना माने जाते है।

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