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घरेलू हिंसा से अब भी मुक्ति नहीं महिलाओं को

 क्या सच में महिलाओं की स्थिति सुधरी है? बाहर जाकर कुछ हजार रुपए कमाने वाली महिलाएं, गृहणियों से ऊपर क्यों मानी जाती हैं? ऐसा नहीं हैं कि ये महिलाएं बाहर नौकरी करके आत्मनिर्भर हैं और गृहणियां घर में रहकर बेकार हैं। क्या मां की ममता, पत्नी का कर्तव्य, बहू के रूप में महिला का त्याग इन सब के कोई मायने नहीं?  आज भी कई घर ऐसे हैं जहां महिलाएं दिन रात काम करती हैं फिर भी घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। सड़क पर चलते हुए छेड़छाड़ और बलात्कार की भी शिकार हो जाती हैं। यही नहीं घर में भी यौन उत्पीड़न का निशाना बनती हैं।

ऐसा नहीं कि महिलाओं को सिर्फ अपने पतियों से ही परेशानी है। अकेली औरत को भी उसके माता−पिता नहीं पूछते। कारण मात्र एक ही होता है कि वह असहाय नारी है। यह सब इसलिए होता हैं क्योंकि महिलाएं सजग नहीं होतीं। लेकिन अब तस्वीर धीरे−धीरे बदल रही है।

दरअसल, भारत के महानगरों और कस्बों में पढ़ी−लिखी महिलाएं भी घरेलू हिंसा से निपटने के लिए बने कानून डीवीए (डोमेस्टिक वायलंस एक्ट) के बारे में नहीं जानतीं। अक्टूबर, 2006 में बने अधिनियम की जानकारी अब कई शहरी महिलाओं को ही नहीं, तो छोटे शहरों−कस्बों और गांव की कम पढ़ी और निरक्षर महिलाओं को क्या होगी? हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के लिए जब यह कानून बना था तब उम्मीद जगी थी कि घरेलू हिंसा से महिलाओं को मुक्ति मिलेगी। क्योंकि यह अधिनियम उन महिलाओं के लिए खास−तौर से बना था जो पति या ससुराल वालों से मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित होती हैं।

पहले जहां पुरुषों से प्रताड़ित महिलाएं भारतीय दंड सहिता की धारा 498 ए पर केस कर अपने लिए तलाक और इंसाफ मांगती थी। वहीं आज डीवीए एक्ट के आने के बाद महिलाएं किसी भी तरह की घरेलू हिंसा के खिलाफ केस कर सकती हैं। न सिर्फ शादी−शुदा बल्कि कोई भी महिला। घरेलू हिंसा को पारिभाषित करता यह एक ऐसा कानून है जिसमें किसी भी तरह की प्रताड़ना जैसे धमकी देना, गाली देना, शारीरिक व मानसिक चोट पहुंचना, आर्थिक सहायता न देना या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना तक सभी शामिल हैं। सरकार ने अधिकारी भी तैनात किए हैं जो इस हिंसा की छानबीन करते हैं। वे घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं और बच्चों की मदद करते हैं।

घरेलू हिंसा जैसे अपराध चाहे वह पति करे या कोई और, महिलाओं को जबरदस्त मानसिक आघात देता है जिससे वह जीवन भर एक डर या खौफ में जीती हैं। ऐसे हालात से उबर पाना काफी मुश्किल होता है। कई मामलों में तो महिलाओं का नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता है या उन्हें हार्ट−अटैक भी हो जाता है। आम महिला पूरी तरह अपने पति पर निर्भर होती है जबकि कई मामलों में पति उसे अपनी जायदाद समझने लगता है। वह उसके लिए मनोरंजन का साधन होती है और चुपचाप हिंसा को सहती जाती है।

 

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