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डंडे खाने पर कुँवारों को यहाँ शीघ्र मिल जाती है दुल्हन

नई दिल्ली। प्रथायें किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की वो आदतें होती है जो वर्षों से उनके व्यवहार का हिस्सा होती हैं. ये व्यवहार दैनिक हो सकती है अथवा अवसर-विशेष. राजस्थान के इस गाँव में भी एक प्रथा वर्षों से प्रचलन में है. ये प्रथा शादी से जुड़ी होने के कारण अत्यंत रोचक भी है. करीब दस दशकों से कायम यह प्रथा ऐसी है जिसमें लड़कियाँ लड़कों को डंडे मारती है. इससे बचने के लिये लड़के भागते हैं. इस बीच जिस लड़के को डंडा छू जाती है उसका विवाह शीघ्र हो जाता है.

क्या कहते हैं बूढ़ेबुजुर्ग

मारवाड़ में रहने वाले पुरूष धींगा गवर के दर्शन नहीं करते. धींगा गवर के दर्शन से पुरूषों की शीघ्र मृत्यु की आशंका और उससे उपजी अफ़वाह के कारण पुरूष इससे बचने की कोशिश करते थे. लेकिन धींगा गवर की पूजा करने वाली सुहागिन महिलायें मध्य रात्रि में हाथ में बेंत अथवा डंडा फटकारते और गीत गाती हुई चलतीं हैं. डंडा फटकारने का आशय पुरूषों को सावधान करने से है.

राह में पुरूष दिखते ही महिलायें उन पर बेंत अथवा डंडे फेंकती है. कभी बेंत की चोट खाने के कुछ ही दिनों बाद किसी युवक की शादी हो गयी होगी जिसके बाद से इस प्रथा को वहाँ मान्यता मिल गयी. समय बीतने के साथ इस प्रथा ने मेले का रूप ले लिया जिसे बेंतमार गणगौर का नाम दिया गया.

धींगा गवर की पहचान

किंवदंतियों की मानें तो ईसर और गवर शिव व पार्वती के प्रतीक हैं. धींगा भील जनजाति की एक महिला थी जिसके पति का निधन शादी के कुछ दिनों बाद हो गया था. दोबारा ईसर जैसा पति मिलने की कामना से ही ईसर-गवर को पूजने की शुरूआत हुई. बेंतमार गणगौर में विधवा को भी पूजा करने की छूट है. यह पूजा मुख्य रूप से मारवाड़ के क्षेत्र में की जाती है

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