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दमदम संसदीय सीट पर सौगत की मुश्किल होगी राह

कोलकाता, 14 मई (हि.स.)। पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान अपने अंतिम पड़ाव में है। सातवें यानी आखिरी चरण का मतदान 19 मई को होगा। इस दिन नौ सीटों पर वोट डाले जाएंगे। उनमें से एक सीट दमदम संसदीय सीट भी है। यहां से तृणमूल के निवर्तमान सांसद सौगत राय इस बार भी संसदीय उम्मीदवार हैं और उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक शमिक भट्टाचार्य ने ताल ठोकी है।

दमदम सीट पर मुकाबला बेहद खास है। क्योंकि राज्य की अन्य सीटों की तुलना में यहां के उम्मीदवार प्रोफ़ेसर सौगत पर आरोप है कि वह शिक्षक होने के बावजूद नारद स्टिंग जैसे घोर भ्रष्टाचार वाले मामले में संलिप्त हैं। साल 2016 में विधानसभा चुनाव के पहले नारद न्यूज़ पोर्टल द्वारा जारी किए गए स्टिंग ऑपरेशन में सौगत राय को एक फर्जी कंपनी के सीईओ बने न्यूज पोर्टल के मालिक मैथ्यू सैमुअल से पांच लाख रुपये घूस लेते हुए देखा गया था। इस बार जब वह संसदीय उम्मीदवार बने हैं तो यह मुद्दा भाजपा ने पूरे क्षेत्र में जमकर उठाया है। इसके अलावा बांग्लादेशी अभिनेता नूर से उन्होंने चुनाव प्रचार कराया था, जिसकी वजह से नूर को भारत का वीजा खोना पड़ा और उनके भारत में प्रवेश पर भी बैन लग गया है। ऐसे में यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।

दमदम लोकसभा सीट उत्तर चौबीस परगना जिले में आती है। सौगत राय ने पहली बार 2009 में दमदम सीट से जीत हासिल की थी। उन्होंने सीपीएम के अमिताभ नंदी को शिकस्त दी थी। 2014 के चुनाव में सौगत राय ने दोबारा जीत हासिल की। इस बार उन्होंने सीपीएम के असिम कुमार दासगुप्ता को हराया था। 

कौन-कौन हैं चुनावी मैदान में

तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार सौगत राय के मुकाबले में इस बार सीपीएम ने नेपालदेव भट्टाचार्य को उतारा है। भाजपा उम्मीदवार शमिक भट्टाचार्य भी मुकाबले में हैं। जबकि कांग्रेस ने इस सीट पर सौरव साहा को उम्मीदवार बनाया है, वहीं शिवसेना ने इस सीट से इंद्रनील बनर्जी को टिकट दिया है।

2014 का जनादेश

2014 के चुनाव में इस सीट से सौगत राय ने डेढ़ लाख से ज्यादा के वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। सौगत को 4 लाख 83हजार 244 वोट हासिल हुए थे। सीपीएम उम्मीदवार असिम दासगुप्ता को 3 लाख 28 हजार 310 वोट मिले थे। भाजपा के तपन सिकदर तीसरे नंबर पर रहे थे। उन्हें 2 लाख 54 हजार 819 वोट मिले थे।

राजनीतिक इतिहास

दमदम सीट पर कभी किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं रहा। 90 के आखिरी के दशक में यह सीट भाजपा के खाते में रही। कभी सीपीएम तो कभी तृणमूल का कब्जा रहा। सबसे पहले 1977 में इस सीट पर चुनाव हुए। उस चुनाव में भारतीय लोकदल के टिकट पर अशोक कृष्ण दत्त जीतकर संसद पहुंचे। 1980 के चुनाव में सीपीएम ने बाजी मारी। निरेन घोष सांसद चुने गए। इसके बाद 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। कांग्रेस के आशुतोष लाहा संसद पहुंचे। 1989 से लेकर 1998 तक इस सीट पर सीपीएम का कब्जा रहा। 1989 से लेकर 1996 के चुनाव में लगातार निर्मल कांति चटर्जी चुनाव जीते। इसके बाद के दो चुनाव में भाजपा को जीत मिली। 1998 और 1999 के चुनाव में भाजपा के तपन सिकदर जीतकर सांसद बने। 2004 के चुनाव में सीपीएम ने वापसी की और अमिताभ नंदी यहां से चुनकर संसद पहुंचे। इसके बाद से इस सीट पर टीएमसी के सौगत राय जीतते आ रहे हैं।

क्या है समीकरण

दमदम के इलाके को अंग्रेजों के शासन के दौरान सेना के इलाके के रूप में विकसित किया गया था।1757 में बंगाल के नवाब ने ये इलाका अंग्रेजों को दे दिया था। 1783 में यहां सेना की छावनी तैयार हुई। बाद में यह शहर अंग्रेजों के लिए सेना और शस्त्रागार का अड्डा बन गया। यहां बंदूकों के कारखाने लगाए गए। 1884 में यहां आर्डिनेंस फैक्ट्री बनी।

दमदम संसदीय क्षेत्र में सात विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें- खड़दह, दमदम उत्तर, पानीहाटी, कमरहट्टी, बरानगर, दमदम और राजारहाट-गोपालपुर शामिल हैं। यहां की जनसंख्या मिलीजुली है। हिंदीभाषियों की अच्छी खासी तादाद है। करीब 98फीसदी आबादी शहरी इलाकों में रहती है। तकरीबन 10 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजातियों की है। अधिकतर लोगों की आजीविका का जरिया रोजगार ही है। यहां कोलकाता का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, लेकिन इलाके में अपराधियों का भी दबदबा है और प्रायः हर महीने किसी न किसी की हत्या वर्चस्व की लड़ाई में होती है।

 

 

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