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नरेन्द्र मोदी : नाम का जादू बरकरार

इस बार के लोकसभा चुनाव परिणामों में एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के नाम का डंका बजा है। जहां सत्ता पक्ष ने तो मोदी के नाम पर वोट मांगे ही थे, वहीं विरोधी दलों ने भी किसी न किसी रुप में मोदी का नाम लेकर ही वोट मांगे। हालांकि विपक्षी दलों ने मोदी का नाम जैसे भी लिया हो, लेकिन वह उक्ति किसी काम नहीं आ सकी। भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे हैं। इस बार के चुनाव परिणामों ने दिखा दिया कि देश में बहुत बड़ा अंडर करंट था, जिसे देश के राजनीतिक दल देख नहीं पा रहे थे। इस मोदी लहर में कांग्रेस के बड़े दिग्गज भी धराशायी होते दिखाई दिए।

अभी छह महीने पहले ही कांग्रेस ने जिन तीन बड़े राज्यों में भाजपा के हाथ से सत्ता छीनी थी, वहां तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ जैसा ही होगया। मध्यप्रदेश में जिस एक सीट छिन्दवाड़ा में कांग्रेस ने विजय प्राप्त की है, उसके बारे में राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा यही कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस की जीत नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री कमलनाथ की जीत है।

अगर कांग्रेस की जीत होती तो मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल से और ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से जीत जाते। मोदी लहर में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के पराजित होने के पीछे का कारण यह भी माना जा रहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बेदाग छवि को दागदार बनाने का असफल प्रयास किया। कहा जाता है कि जब एक स्वच्छ छवि के व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया जाता है तो स्वाभाविक रुप से जनता का समर्थन उसे मिल ही जाता है।

भारतीय राजनीति

संभवत: नरेन्द्र मोदी के साथ भी ऐसा ही हुआ है। वास्तविकता यही है कि विपक्षी दलों द्वारा मोदी की जीत के रास्ते तैयार किए गए। हम यह भी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने अहंकार में संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहती हैं कि मैं नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानती। यह एक प्रकार से उस जनादेश का अपमान ही था जो 2014 में देश की जनता ने दिया था। ऐसी गर्वोक्ति वाली भाषा को कोई भी पसंद नहीं कर सकता।

इस चुनाव परिणाम ने एक और बहुत बड़ा संदेश यह भी दिया है कि जनता ने वंशवाद को पूरी तरह से नकार दिया है। विरासती पृष्ठभूमि से राजनेता बने राहुल गांधी के नेतृत्व ने देश ने नकार दिया है और इसी कारण जनता ने उन्हें गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी में आइना दिखा दिया है।

वह तो भला हो राहुल गांधी के सलाहकारों का उन्होंने उनको वायनाड जाने की सलाह दे दी। इससे कांग्रेस को दोहरा लाभ भी मिला है। केरल में कांग्रेस की स्थिति सुधरी है। सवाल यह आता है कि अगर राहुल गांधी वायनाड नहीं जाते तो केरल में कांग्रेस मजबूत नहीं होती। ऐसे में कांग्रेस की क्या गत होती, हम सभी जानते हैं। कांग्रेस को जितनी सीटें मिली हैं, उनमें से केरल की सीटों को हटा दिया जाए तो कांग्रेस की स्थिति 2014 से बुरी हो जाती। 

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