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पूर्वजों की स्मृति का पक्ष है-श्राद्धपक्ष

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श्राद्धपक्ष अपने पूर्वजों की स्मृति का पक्ष है। इस काल में अपने पूर्वजों-पितरों के निमित दान-आदि की परम्परा है। कहते हैं कि पृथ्वीलोक में जैसा दान मनुष्य द्वारा किया जाता है वैसा ही सामान उसे मृत्यु के बाद उपभोग हेतु स्वर्गलोक में प्राप्त होता है। इस संबंध में महादानी कर्ण से जुड़ी महाभारत की एक प्रसिध्द कथा है- कर्ण अपनी दानशीलता के लिये जाने ही जाते थे।

इनका नियम था कि वे सोने का दान करते थे। स्वर्णदान करने के कारण, मृत्यु उपरांत इन्हें उपभोग के लिये स्वर्ण निर्मित सामग्री प्राप्त हुई। स्वर्गलोक में कर्ण को सोने का महल तो मिला ही, खाद्यान्न भी स्वर्ण निर्मित प्राप्त हुए। अब भला सोना खाया कैसे जाये?पूछने पर पता चला कि जैसा दान दिया गया है, वैसी ही सामग्री उपभोग हेतु प्राप्त होगी।

श्राद्ध कनागत शब्द ही नहीं, हमारी संस्-ति की एक महान परम्परा रही है। इसके चलते सामाजिक व्यवस्था को कायम रखने का विशेष कार्य हुआ। इससे जहां एक ओर अपने पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान की बात हुई, वहीं दूसरी ओर सामाजिक संगठन भी सुदृढ़ बनता है। पूर्वजों के कार्यों का स्मरण कर उनके समान ही सामाजिक कार्यों की प्रेरणा मिलती है। इस पक्ष में सन-दान-श्रध्दा के नाम से अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष दोनों रूपों से समाज में सहयोग की भावना पैदा होती है। यह पक्ष भारतीय संस्-ति का एक महत्वपूर्ण बिन्दू है। इसके प्रभाव को देख विदेशी जनों ने भी इसकी प्रशंसा की है। 

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