हटके ख़बर

बच्चों में पारिवारिक संस्कारों की जरूरत

बच्चों का भटकाव

यह सब बातें वास्तविकता से कितनी दूर है, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। पहले जब ‘शक्तिमान’ सीरियल आता था, तब न जाने कितने बच्चों ने उसकी नकल करने की कोशिश की थी और उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा था। आज के समय में इन सीरियलों के सामने बच्चों को बिठाकर माता-पिता सोचते हैं कि उनके बच्चे सुरक्षित हैं।

वे एक जगह बैठे तो हैं, लेकिन माता-पिता को यह नहीं पता कि चंचल बच्चे टी-वी- के सामने सीरियल को देखते-देखते उसको करने का प्रयास करते हैं, जो उनके जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, कहीं-कहीं हुआ भी है। कुछ वर्ष पहले इंदौर में, भोपाल में और देश के कई अन्य शहरों में बच्चों ने खेल-खेल में फांसी लगा ली थी और उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। अब जरा सोचिए, हम बच्चों को क्या दे रहे हैं। बच्चे कल्पना में जीना सीख रहे हैं।

बच्चे गैजेट माता-पिता को समझते हैं, उनकी मांगें रोज-रोज होती है। ऐसी मांगों में नाजायज मांगें भी होती है, उन्हें ज्यादातर माता-पिता पूरी करने की कोशिश करते भी है, मुख्यतः वह माता-पिता, जो दोनों नौकरी करते हैं।

मांगें पूरी करने के लिए अपनी ईमानदारी से कई बार भटक भी जाते हैं और नहीं पूरी कर पाते तो बच्चे भटक जाते हैं। इस पूरे वाक्य में बच्चे की गलती कहां है बताइए?

पुराने समय में चूकि टी-वी- नहीं हुआ करता था, इसलिए ‘बाल कल्याण’,‘चंपक’, ‘अमरचित्र कथाएं’ इत्यादि पढ़ने की मिलती थी, जिससे बच्चे चरित्रवान लोगों के बारे में जानते थे। आज यदि बच्चे बाल अपराधी बन रहे हैं तो अभी भी क्या दोष आप बच्चों को ही देंगे? नहीं अब दोष या तो माता-पिता का है या समाज का।

अब दूसरे तरह के सीरियलों की बात करें। ओगी एवं कॉकरोच में कॉकरोचों के द्वारा संबंधों की बात दिखाई जाती है तो दूसरी ओर नोबिता एवं शिजुका के रिश्तों की बात बच्चों को परोसी जाती है।

इस तरह के संबंध हम 4-5 साल के बच्चों को दिखा रहे हैं, सिखा रहे हैं। यह तो सीरियल की बात हो गई लेकिन उन घरों में, जिनमें एक ही कमरे में कई-कई लोग रहते हैं, वहां बच्चे क्या देखते और सीखते हैं, अंदाजा लगा सकते हैं?

यह भी पढें: नागराज का ट्रेलर रिलीज 

 

Tags
Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *