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भंवर म्हाणे पूजन दो गिणगौर….

उदयपुर। ‘भंवर म्हाणे पूजन दो गिणगौर….’ गणगौर के इस गीत के साथ सिर पर ईसर बावजी और गणगौर माता की सुश्रंगारित प्रतिमाओं को लिए सोलह शृंगार से सजी-धजी नवोढ़ाएं घूमर लेती हैं, तो राजस्थान की सतरंगी परम्पराओं की चित्ताकर्षक झलक देखने वालों को बांध देती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं राजस्थान के प्रसिद्ध गणगौर पर्व की जो नवसम्वत्सर की वेला के साथ चैत्र शुक्ल तृतीया से शुरू होता है और चार दिन तक चलता है।

अच्छे वर की कामना का है पर्व

देखा जाए तो इस पर्व की शुरुआत होली के दूसरे दिन से ही हो जाती है। पूजन के लिए ईसर बावजी (शिव स्वरूप) और गणगौर (पार्वती/गौरी) कुंवारी कन्याएं बागों में जाकर दूब, फूल-पत्तियां चुनकर लाती हैं और उनसे ‘सेवरा’ सजाती हैं। गीत गाती हैं और गणगौर माता को रिझाती हैं ताकि उन्हें अच्छा वर मिले। 

पहले दिन लाल चूंदड़, दूसरे दिन पीली, तीसरे दिन हरी तो चैथे दिन गुलाबी गणगौर की सवारी निकलेगी। इससे पूर्व सोमवार को विभिन्न समाजों के नोहरों में दांतण हेला का पर्व मनाया गया। गणगौर माता को सोलह शृंगार धराए गए जिनमें बिन्दी, गजरा, सिन्दूर, टीका, नथ, काजल, चूड़ियां – कंगन, मंगलसूत्र और हार, लाल रंग की चुन्दड़ या अन्य लाल वस्त्र, मेहंदी, बाजूबंध, कानों के कुंडल, कमरबंध , अंगूठी, पायल, बिछिया आदि शामिल हैं। 

गणगौर की पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं। इस पर्व में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है तथा उन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम लिए जाते हैं। राजस्थान के कई प्रदेशों में गणगौर पूजन एक आवश्यक वैवाहिक रस्म के रूप में भी प्रचलित है। गणगौर पूजन में कन्यायें और महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य ,अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से हर वर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं।

गणगौर तीज 

महिलाएं गणगौर की तीज के पहले सिर धोती हैं, मेंहदी लगाती हैं, मीठे तथा बेसन के नमकीन गुने (अपनी रीति अनुसार) बनाती हैं। तीज के दिन बेसन में हल्दी मिलाकर पार्वतीजी को चढ़ाने के लिए सिर से पैर तक के गहने बनाकर चढ़ाती हैं। महिलाएं श्रृंगार करके पूजन की थाली को विधिवत सामग्री से सजाती हैं। दो दूनों में 8-8 नमकीन गुने रखें। 16-16 दूबों के 2 गुच्छों (पोया) बनाकर रखें।

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