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महागठबंधन: सीट शेयरिंग को लेकर दबाव की राजनीति शुरू

-जीतनराम मांझी का बड़ा बयान ,20 सीटों पर पार्टी की तैयारी
गया। बिहार में एनडीए के घटक दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर निर्णय हो चुका है।अब महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीट की संख्या और चुनाव क्षेत्र को लेकर दबाव बनाने की रणनीति शुरू हो गई है।इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी का बिहार में 20 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की “तैयारी” को लेकर गया में दिया गया बयान महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर मचे घमासान को जोड़कर देखा जा सकता है।

श्री मांझी गुरुवार को गया में अपने गोदावरी मुहल्ले में स्थित आवास पर मीडियाकर्मियों से रूबरू हुए। उन्होंने 40 में से 20 लोकसभा चुनाव क्षेत्र में पार्टी की तैयारी को लेकर एक बड़ा बयान दे दिया।श्री मांझी ने आगे कहा कि महागठबंधन के प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं।साथ ही यह भी कहा कि अखिलेश यादव, ममता बनर्जी सहित कई विपक्षी दलों के नेता चुनाव बाद आपस में मिल- बैठकर किसी को भी नेता घोषित कर सकते हैं।

श्री मांझी से प्रदेश अध्यक्ष वृष्ण पटेल के बयान को लेकर सवाल पूछा गया था।श्री मांझी ने कहा कि पटेल जी का बयान पार्टी का अधिकृत बयान नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने आगे कहा कि वैसे बिहार के 40 में से 20 लोकसभा चुनाव क्षेत्र में पार्टी का अच्छा जनाधार है। पार्टी ऐसे सभी 20 लोकसभा चुनाव क्षेत्र में “तैयारी” कर चुकी है जहां से चुनाव लड़ने से लेकर महागठबंधन के प्रत्याशियों को मदद करने की रणनीति शामिल है। 

श्री मांझी से उपेन्द्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने से “हम” पार्टी को राजनीतिक नुकसान होने को लेकर सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि उपेन्द्र कुशवाहा के आने से महागठबंधन को मजबूती मिली है लेकिन यह भी सच्चाई है कि जहां पहले “एक रोटी चार व्यक्ति” मिलकर खाते वहां पांचवां हिस्सा “रोटी” का लगेगा।

उन्होंने कहा कि संक्रांति के बाद महागठबंधन के सभी घटक दल के नेता मिल-बैठकर सीट की संख्या को लेकर अंतिम निर्णय ले लेंगे।
श्री मांझी ने लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान पर करारा हमला बोलते हुए दावा किया कि वे अब दलित-महादलित समाज के नेता नहीं रहे। उन्होंने कहा कि एससी/एसटी एक्ट के बदलाव के विरोध में समाज सड़कों पर था।तब रामविलास पासवान ने समाज के आंदोलन को “कुछ ऐरो-गैरो” का कहकर मजाक उड़ाया।

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