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महाशिवरात्रि, जानिए शुभ मुहूर्त, व्रत का महत्व और पूजन विधि

 देवों के देव महादेव को खुश करने वाला आस्था से परिपूर्ण महाशिवरात्रि का व्रत सबसे महत्वपूर्ण होता है. जो शख्स भगवान शिव में आस्था रखते हैं वह भोले के महाशिवरात्रि व्रत को जरूर करते हैं. हिंदू धर्म में, महाशिवरात्रि व्रत, पूजा, कथा और उपायों का खास महत्व होता है. महाशिवरात्रि 2019 तिथि की बात करें तो, इस बार महाशिवरात्रि 4 मार्च की पड़ रही है. अमूमन महाशिवरात्रि फरवरी या मार्च के माह में पड़ती है.

कब होती है महाशिवरात्रि
महाशिवरात्रि व्रत कब मनाया जाए, इसके लिए शास्त्रों के अनुसार निम्न नियम तय किए गए हैं-
1. चतुर्दशी पहले ही दिन निशीथव्यापिनी हो, तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाते हैं. रात्रि का आठवां मुहूर्त निशीथ काल कहलाता है. सरल शब्दों में कहें तो जब चतुर्दशी तिथि शुरू हो और रात का आठवाँ मुहूर्त चतुर्दशी तिथि में ही पड़ रहा हो, तो उसी दिन शिवरात्रि मनानी चाहिए.
2. चतुर्दशी दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है.
3. उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाक़ी हर स्थिति में व्रत अगले दिन ही किया जाता है.

महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त
निशीथ काल पूजा मुहूर्त : 24:08:03 से 24:57:24 तक अवधि :0 घंटे 49 मिनट
महाशिवरात्री पारणा मुहूर्त : 06:43:48 से 15:29:15 तक 5th, मार्च को

ऐसे करें भगवान शिव की पूजा
धतूरा और भांग, पानी, दूध और शहद के साथ भगवान शिव का अभिषेक.
सिंदूर और इत्र शिवलिंग को लगाया जाता है. यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है
बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं
फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की संतुष्टि को दर्शाते हैं.
दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है.
जलती धूप, धन, उपज (अनाज).
पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ संतोष अंकन करते हैं

शिवरात्रि का महत्‍व
चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ अर्थात स्वयं शिव ही हैं. इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के तौर पर मनाया जाता है. ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है. गणित ज्योतिष के आंकलन के हिसाब से महाशिवरात्रि के समय सूर्य उत्तरायण हो चुके होते हैं और ऋतु-परिवर्तन भी चल रहा होता है. ज्योतिष के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी कमज़ोर स्थिति में आ जाते हैं. चन्द्रमा को शिव जी ने मस्तक पर धारण किया हुआ है- अतः शिवजी के पूजन से व्यक्ति का चंद्र सबल होता है, जो मन का कारक है. दूसरे शब्दों में कहें तो शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मज़बूत करती है और अन्तःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है.

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