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मुकाबला नरेन्द्र मोदी बनाम अन्य

लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो गया है। इसके साथ ही आंध्रप्रदेश, ओडिशा, अरूणाचल और सिक्किम विधानसभा के भी चुनाव होंगे। चुनाव आयोग ने मतदान की तिथि 11 अप्रैल, 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई निर्धारित की है। सात चरणों में लोकसभा के चुनाव होंगे। 42 दिन तक चलेगा चुनावी महासमर। 23 मई को मतों की गिनती की जाएगी। सभी पोलिंग स्टेशनों में वीवीपैट मशीन होगी। इसमें जान सकेंगे कि उसका वोट किसे पड़ा है। 

चुनाव की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट किया कि ‘सबका साथ सबका विकास पर चलने वाला राजग आपका आशीर्वाद चाहता है। हमने पिछले पांच वर्ष मूलभूत आवश्यकता पूरा करने में बिताया, जो सत्तर वर्षों में अधूरी रह गई थी। अब समय आ गया है कि भारत को मजबूत, समृद्ध और सुरक्षित राष्ट्र बनाने के रास्ते पर ले चला जाए।’ चुनावी महाभारत प्रारंभ हो गया है। कहा जाता है कि युद्ध के परिणाम अनिश्चित होते हैं।

युद्ध का ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, इस बारे में कोई निश्चित नहीं होता। महाभारत के युद्ध में लोगों को यह विश्वास रहा कि जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां विजय निश्चित है। इसी प्रकार शिवाजी के बारे में मान्यता थी कि शिवाजी हर संकट और कठिन चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। जहां शिवाजी हैं वहां विजय है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।

कांग्रेस के भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों ने नया राष्ट्रवादी विकल्प चुना। अभी तक सेकुलर नीति का बखान होता रहा। कांग्रेस, समाजवादियों ने यही राग अलापा। जनता को लगा कि हिन्दू विरोधी सेकुलर नीति की गुफा से बाहर निकलकर राष्ट्रवादी विचारों को कसौटी पर कसा जाए। राष्ट्रवादी अवधारणा से ही सबका साथ-सबके विकास के विचार से नरेन्द्र मोदी सरकार ने काम प्रारंभ किया।

गत पांच वर्षों में देश ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ की गई एयर स्ट्राइक के बाद जनता को यह भरोसा हुआ कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है। अब सवाल यह है कि देश को स्थिर और विकास की ऊंचाई पर ले जाने वाले नरेन्द्र मोदी का मुकाबला है राहुल, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी आदि के गठबंधन से।

कांग्रेस का चरित्र सबके सामने है। करीब 55 वर्षों तक कांग्रेस का शासन रहा। यह भी सब जानते हैं कि चंद्रशेखर, चरण सिंह, देवेगौड़ा और गुजराल की सरकारों के साथ कांग्रेस ने धोखेबाजी की। इस मिलावटी गठबंधन के नेतृत्व को यह समझना होगा कि कांग्रेस उनका साथ नहीं दे सकती।

सोनिया किसी भी तरह अपने बेटे राहुल को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहती हैं। सवाल यह है कि क्या गठबंधन के नेता राहुल का नेतृत्व स्वीकार करेंगे। क्या जनता इस पर भरोसा करेगी। बहरहाल, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा कि भविष्य का भारत किसकी अगुवाई में चलेगा। 

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