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श्रद्धापूर्वक मनाई गई गोपाष्टमी, लोगों ने की गाय की पूजा

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शनिवार को कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया गया। लोगों ने गाय व बछड़े की पूजा की। उनको चारा खिलाकर सुख समृद्धि की कामना की।
गोपाष्टमी और भगवान कृष्ण के बीच गहरा संबंध है। ज्योतिषाचार्य पं. प्रदीप जोशी के अनुसार द्वापर में बाल कृष्ण ने इसी दिन से अपनी गायों को चराने के लिए ले जाना प्रारंभ किया था। सांयकाल गायों के घर वापसी के करण गायों के खुरों से उठने वाली धूल के कारण ही सांयकाल को गोधूली बेला कहा जाता है। वहीं कुछ का मानना है कि जब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी पर उठा कर ब्रजवासियों को इंद्र के कोप से बचाया था तो सात दिन बाद गोपाष्टमी को ही इंद्र ने अपनी हार स्वीकार कर कृष्ण से क्षमा मांगी थी।
गोपाष्टमी पर लोगों ने गाय बछड़े को स्नान कराकर उन पर मेहंदी, हल्दी के छापे लगाकर श्रंगार किया। उसके बाद तिलक फूल और भोग से उनकी पूजा की। इसके पश्चात उनकी आरती गायों को गौ-ग्रास दिया। आश्रम व अखाड़ों में भी गोपाष्टमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। वहां भी गाय व बछड़े की पूजा की गई। तथा उन्हें गौ ग्रास खिलाया।

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