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समलैंगिकता अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की.

धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. 24 साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अंतिम फ़ैसला दिया है.

चीफ़ जस्टिस ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नहीं है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी.

आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है. व्यक्तित्व को बदला नहीं जा सकता. यह खुद को परिभाषित करता है, यह व्यक्तित्व का गौरवशाली रूप है. शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या है. वास्तव में इसका मतलब था कि जो मायने रखता है वो महत्वपूर्ण गुण और मौलिक विशेषताएं हैं न कि किसी व्यक्ति को क्या कहा जाता है. नाम व्यक्ति की पहचान का एक सुविधाजनक तरीका हो सकता है लेकिन उसके गुण ही उसकी पहचान है.

धारा 377

किस जज ने क्या कहा?

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि आज का फ़ैसला इस समुदाय को उनका हक देने के लिए एक छोटा सा कदम है. एलजीबीटी समुदाय के निजी जीवन में झांकने का अधिकार किसी को नहीं है.

जस्टिस इंदु मल्होत्रा में कहा कि इस समुदाय के साथ पहले जो भेदभाव हुए हैं उसके लिए किसी को माफ़ नहीं किया जाएगा.

जस्टिस नरीमन ने कहा ये कोई मानसिक बीमारी नहीं है. केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ठीक से समझाए ताकि एलजीबीटी समुदाय को कलंकित न समझा जाए.

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?

फ़ैसले का स्वागत करते हुए आईआईटी मुंबई के याचिकाकर्ता कृष्णा ने कहा, “आईआईटी में दाखिला मिलने पर भी इतनी खुशी नहीं हुई थी, जितनी आज हो रही है. मैं इतना खुश हूं कि आंखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे. फिलहाल ये नहीं पता कि इस फैसले से मेरे जीवन में क्या फ़र्क पड़ने वाला है, लेकिन इतना जरूर है कि अब बिना किसी डिप्रेशन, बिना किसी डर के हम भी जीवन जी सकेंगे.”

ललित ग्रुप ऑफ होटल के केशव सूरी ने फैसले का स्वागत करते हुए बीबीसी से बात की. उनके मुताबिक लड़ाई अभी बाकी है. आगे अपने अधिकारों की लड़ाई हमे लड़नी होगी. लेकिन इसे अपराध के दायरे से बाहर निकलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. सुप्रीम कोर्ट और समुदाय को हमसे माफी मांगने की जरूरत है.

 

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