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साक्षरता को लेकर हमारी सरकारें कभी ईमानदार नहीं रहीं

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साक्षरता को लेकर हमारी सरकारें कभी ईमानदार नहीं रहीं। यदि रहती तो आजादी के 69 वर्ष बाद भी देश असाक्षरता, पिछड़ापन, गरीबी, बेरोजगारी एवं विषमताओं जैसी चुनौतियों से जूझता हुआ कदापि नजर नहीं आता। देश में बढ़ती आबादी और जरूरतमंदों के हिसाब से सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों, पुलिस थानों एवं डाकघरों की संख्या नहीं बढ़ी। यह कहना कदापि गलत न होगा कि सरकारों ने शिक्षा एवं चिकित्सा क्षेत्रें को समय के अनुरूप संवारने का प्रयास ही नहीं किया। दम तोड़ते अस्पतालों एवं स्कूल जीते-जागते सबूत हैं।

पंडित नेहरू देश का विकास चाहते थे। उन्हें कांग्रेसी नेताओं ने आधुनिक भारत का निर्माता भी कहा फिर आधुनिक भारत के निर्माता से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई कि 1947 से 1957 के दौरान प्राईमरी शिक्षा एवं चिकित्सा दोनों ही उपेक्षा के शिकार हुए। यूजीसी पर खास ध्यान दिया गया। महानगरों के विकास को प्राथमिकता दी गई तथा गांवों की जबरदस्त अनदेखी की गई, यानी कांग्रेस सरकार ने दलित, अल्पसंख्यक वर्ग के साथ धोखाधड़ी की, छलावा किया। ऐसा प्रधानमंत्री आधुनिक भारत का निर्माता कैसे हो गया, समझ से परे है।

सरकारी फरमान के मजाक की परंपरा पंडित नेहरू के कार्यकाल में ही स्थापित हो चुकी थी। लालकिले से देश को संबोधित करते समय यह कहना कि हम गांवों का विकास करेंगे, गरीबी, पिछड़ापन, असाक्षरता व बेरोजगारी को समाप्त करेंगेे, क्या मायने रखता है। आज तक समान आचार संहिता हमारे देश में लागू नहीं हो पाई। पाठयक्रम को लेकर विवाद बरकरार है। स्कूल यूनिफार्म को लेकर विवाद जारी है। राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाली सेना के लिए समान यूनिफार्म है पर स्कूली बच्चों के लिए पूरे देश में एक पाठ्यक्रम, एक यूनिफार्म पर कभी ईमानदारी से चिंतन हुआ ही नहीं।

सरकारी तंत्र के पास डाटा है फिर क्यों पुस्तकें स्कूल शुरू होने से पूर्व स्टॉलों तक नहीं पहुंच पाती। पूरे वर्ष भर अभिभावकगण पुस्तकों के लिए भटकते रहते हैं। वहीं निजी प्रकाशकों की पुस्तकें स्टालों पर वर्ष भर नजर आती हैं। यदि सरकार पुस्तकों के अलावा स्टेेशनरी भी स्वयं तैयार करे और शिक्षण विभाग जरूरी जानकारी कॉपियों में अंकित करे तो एक बहुत ही जबरदस्त क्रांति आ सकती है।

सरकार ने नेताओं के हित को मद्देनजर रखते हुए शिक्षा का बाजारीकरण किया। दुष्परिणाम आंखों के सामने हैं। दुर्भाग्य यह है कि उसके बावजूद भी सरकार कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं।

करोड़ों का मुनाफा दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले डायरेक्टर, स्कूल संचालक, प्राचार्यों की होती है। यही वजह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आदेश का किसी भी शैक्षणिक संस्था एवं संस्थान पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि पड़ता तो कम से कम किताबें निजी प्रकाशकों की लगाई जाती।

किताबों की सुलभता की गारंटी लेकर यदि सरकार फरमान जारी करती तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव पड़ता। कहीं न कहीं सरकार स्वयं भी दोषी है, क्योंकि सरकार अपनी किताबें सही समय पर बगैर किन्हीं दिक्कतों के आज तक उपलब्ध नहीं कर पायी है।

हर वर्ष अभिभावक दुकानें के चक्कर लगा लगाकर थक जाते हैं किंतु उन्हें समय पर पाठ्य सामग्री नहीं मिल पाती है। काश सरकार अपने ही फैसले की लाज रखने हेतु उचित कार्रवाई करती तो पालकों पर बेवजह के खर्च का दबाव कदापि नहीं पड़ता।

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