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हजारों साल पुराने कल्पवृक्ष में खिलने लगे कमल जैसे फूल

गर्मी के मौसम में पूरी तरह से सूख जाता है यह विशालकाय वृक्ष

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हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिला मुख्यालय में यमुना नदी किनारे उत्तर दिशा में लगे कल्पवृक्ष का इतिहास करीब डेढ़ हजार साल पुराना है। इस वृक्ष की खासियत देखिये कि इस बार भी गर्मी के मौसम में वृक्ष के सूखने के बावजूद कमल की तरह बड़े सफेद रंग के फूल खिलने लगे हैं। यह फूल देखने में बड़े ही मनोहारी है।

पहले इस वृक्ष में फूल आते हैं फिर फल आते हैं। इसके बाद पत्तियों के आने का सि​लसिला शुरू होता है। वहीं इस वृक्ष पर खिले फूलों को देखने के लिये सुबह शाम लोगों की भीड़ भी उमड़ती है।

जिला मुख्यालय में उत्तर दिशा की तरफ यमुना नदी के ठीक किनारे कल्पवृक्ष इन दिनों सूखने के बाद भी बड़ा ही रमणीक दिखता है। करीब 30 फीट ऊंचाई वाले इस वृक्ष का तना बहुत ही विशालकाय है। वेद और पुराणों में भी कल्पवृक्ष का उल्लेख है। यह वृक्ष स्वर्ग का विशेष वृक्ष माना गया है।

समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में से एक कल्पवृक्ष की भी उत्पत्ति हुई थी। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्रदेव को दिया गया था। इसे वृक्ष को पद्मपुराण में परिजात भी कहा गया था मगर इस इकलौते कल्पवृक्ष को विकसित करने के लिये प्रभावी ढंग से कोई कार्ययोजना नहीं बनायी जा सकी। तत्कालीन जिलाधिकारी बी.चन्द्रकला ने कल्पवृक्ष के सुन्दरीकरण के लिये 31 लाख रुपये की धनराशि की व्यवस्था करायी थी वहीं नगर पालिका परिषद हमीरपुर ने भी ढाई लाख रुपये की धनराशि की व्यवस्था की थी।

परिसर पर इन्टरलाकिंग कार्य कराने के साथ ही बाउन्ड्रीवाल का निर्माण कराया गया। साथ ही कल्पवृक्ष प्रांगण पर पुराने कुयें को भी पाटकर समतल किया गया। इसके अलावा रेलिंग युक्त सीढ़ियां पक्के घाट बनाये गये हैं लेकिन परिसर हरी घास लगाये जाने का काम अभी तक नहीं कराया जा सका। यमुना नदी किनारे कल्पवृक्ष पर कटान का खतरा बाढ़ के समय में बना रहता है। तीन साल पहले यमुना और बेतवा नदियों के उफनाने से कल्पवृक्ष के पास बाउन्ड्रीवाल तथा पिचिन में गहरी दरारें पड़ गयी थी जिसकी मरम्मत भी नहीं करायी जा रही है। 

बुजुर्ग बाबा ने कल्पवृक्ष पर की थी तपस्या

यहां के बुजुर्ग जगदीश गुप्ता उर्फ टिल्लू ने गुरुवार को बताया कि मुख्यालय के यमुना नदी किनारे लगा कल्पवृक्ष का इतिहास कम से कम डेढ़ हजार साल पुराना है। उनके दादा परदादा भी इस वृक्ष का जिक्र करते थे। इस वृक्ष को इसी आकार में बचपन से देखते चले आ रहे हैं। यह वृक्ष इतना मनोहारी है कि इसके नीचे बैठने मात्र से दिल को बड़ी शांति मिलती है। कई दशक पहले इस वृक्ष के नीचे इलाहाबाद के एक पहुंचे हुये बाबा ने डेरा जमाया था और उसने कई दिनों तक तपस्या भी की थी जिसे स्थानीय लोगों के विरोध पर यहां से भागना पड़ा था। बाबा यहां बीमार लोगों का इलाज भी करता था। 

सबसे पहले अफ्रीका में देखा गया था कल्पवृक्ष 

फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने इस वृक्ष को वर्ष 1775 में अफ्रीका में सेनेगल में सबसे पहले देखा गया था। इसका नाम अडनसोनिया टेटा रखा गया था। इसे बाओबाब भी कहा जाता है। यह एक बेहद मोटे तने वाला फलदायी वृक्ष है जिसकी टहनियां काफी लम्बी होती है। इसके पल भी बहुत लम्बे होते है। यह वृक्ष पीपल के वृक्ष की तरह फैलता है। इसका तना देखने में बरगद के समान दिखता है। इस कल्पवृक्ष में फूल कमल के फूल की तरह है। इस फूल के बीचो-बीच रखी किसी छोटी से गेंद में निकले असंख्य रुओं की तरह होता है। इस कल्पवृक्ष की उम्र भी 6000 साल तक होती है। 

सिर्फ चुनिन्दा स्थानों पर ही मिलते हैं कल्पवृक्ष 

भारत में रांची, अल्मोड़ा, काशी, नर्मदा किनारे कर्नाटक आदि ही महत्वपूर्ण स्थानों पर कल्पवृक्ष पाये जाते है। यह वृक्ष उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के बोरोलिया में आज भी देखा जा सकता है वहीं बुन्देलखण्ड के सिर्फ हमीरपुर जिला मुख्यालय में यह वृक्ष लोगों के लिये रमणीक बना हुआ है। पर्यावरण के लिये काम कर रहे जलीस खान ने बताया कि एमपी के ग्वालियर के निकट कोलारस में भी कल्पवृक्ष विद्यमान है जिसकी उम्र दो हजार साल से अधिक है। इसी तरह का एक वृक्ष राजस्थान में अजमेर के निकट मांगलियावास में है वहीं दूसरा वृक्ष पुट्टपर्थी के सत्य साँई बाबा आश्रम में आज भी मौजूद है। 

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