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कोरोना से फीकी रही दुर्गा की चमक

कोलकाता । इस बार कोरोना महामारी के कारण पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की चमक तो फीकी रही ही, बजट भी कई गुना कम हो गया है। इस साल हालात इतने ‌खराब रहे कि जिन पंडालों पर करोड़ों रुपये खर्च होते थे, उनका खर्च इस साल 10 लाख तक नीचे आ चुका है। इसका कारण पंडालों को मिलने वाले चंदे से जुड़ा है।

जानकारी के अनुसार, इस साल पंडालों को मिलने वाले चंदे में भारी कमी आई, जिसकी वजह से पंडालों ने अपने खर्च को सीमित कर दिया। बंगाल की दुर्गा पूजा के इतिहास में यह पहली बार देखने को मिला कि जब पंडालों में ना तो कोई खास तामझाम रहा न ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें। पांच दिनों तक चलने वाली कोलकाता की 100 बड़ी पूजा फेस्टिवल में करीब 4500 करोड़ रुपये का लेनदेन होता है।

जबकि, पूरे राज्य में करीब 15,000 करोड़ रुपये का लेन-देन होता है। वहीं, लाखों की संख्या में रोजगार देने वाली इस पूजा ने इस साल कई लोगों को बेरोजगार कर दिया है। दुर्गापूजा का अधिकतर खर्च प्रायोजक पर ही निर्भर करता है। बाकी रकम स्थानीय लोगों से चंदे द्वारा जुटाई जाती है। इस साल कॉरपोरेट जगत से कुछ खास मदद नहीं मिल पाई। कोरोना और लॉक डाउन के कारण लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। हर साल कॉरपोरेट जगत से जितना राशि मिलती थी वह भी काफी कम प्राप्त हो पाया।

 

वहीं कंपनियों का कहना है कि कोरोना के कारण पहले ही वे नुकसान में हैं, उस पर महामारी में ज्यादातर लोग घूमने-फिरने से बच रहे हैं। ऐसे में कंपनियों को ब्रांडिंग से कुछ खास फायदा नजर नहीं आ रहा है। जहां हर साल 30 से 40 लाख तक के बजट में पंडाल तैयार किया जाता था, वह इस बार केवल 10 लाख तक सिमटकर रह गया। हालांकि, इस साल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने सभी रजिस्टर्ड पूजा-पंडाल को सफाई और हाइजीन को ध्यान रखने के लिए अतिरिक्त खर्च को देखते हुए 50-50 हजार रुपये दिए हैं। इस साल दुर्गा पूजा में हजारों लोगों मजदूर से लेकर मूर्तिकार, छोटे-छोटे खाने के स्टॉल लगाने वालों की कमाई पर सीधा असर पड़ा है, जिनकी कमाई हर साल दो से तीन के दौरान दो से तीन लाख की कमाई होती थी, व महज 15-20 हजार रुपये की कमाई कर पाए हैं।

 

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