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कोलकाता में मिट्टी वाले दियों की मांग बढ़ी

कोलकाता। तकनीक का हाथ पकड़कर तेजी से विकसित होती दुनिया के साथ मिट्टी वाले दिये  अप्रासंगिक हो गए थे लेकिन पिछले कुछ सालों में बढ़ी जागरूकता ने लोगों को एक बार फिर मिट्टी वाले दियों की तरफ मोड़ दिया है। कोलकाता का बड़ा बाजार एशिया के उन सबसे बड़े बाजारों में शामिल है जहां घरेलू इस्तेमाल की चीजें बिक्री होती हैं।

बाजार से ठीक सटा हुआ कुम्हारटोली है जहां रहने वाले कुम्हार वैसे तो सालों भर  मूर्तियां बनाने में व्यस्त रहते हैं।  इस बार दीपावली में उन्हें बड़ी संख्या में मिट्टी के दिए बनाने का ऑर्डर भी मिला है। बाजारों में न केवल मिट्टी के दिए बल्कि विभिन्न नक्काशी वाली मूर्तियां भी मांगी जा रही हैं जिसकी वजह से कुम्हार काफी खुश हैं।

इस बार ना केवल बड़ाबाजार बल्कि कोलकाता के धर्मतल्ला, सियालदह, जादवपुर, बउबाजार आदि क्षेत्रों में लगने वाले दीपावली के बाजार भी मिट्टी के दियों से सज गए हैं। 27 अक्टूबर को दीपावली है लेकिन करीब एक सप्ताह पहले से ही लोग इसके लिए बाजार करने लगे हैं। मिट्टी के दिए बेचने वालों का कहना है कि इस बार बड़ी संख्या में लोग दिए खरीद रहे हैं।

विशेष बातचीत में किरण कुमार ने बताया कि हर साल की तुलना में इस साल मिट्टी के दिए अधिक संख्या में बिक रहे हैं। प्रत्येक 1000 दिए बेचने से 300 रुपये का लाभ हो रहा है और प्रतिदिन आसानी से इतने दिए की बिक्री हो जाती है। किरण ने उम्मीद जताई कि दीपावली से तीन-चार दिन पहले यह बिक्री प्रतिदिन 1000 रुपये तक पहुंच जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि जिस बड़ी मात्रा में उन्हें दीपावली के दिए बनाने के ऑर्डर मिले हैं उतना पूरा भी नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले दो साल पहले चाइनीज दियों के सामने मिट्टी के दियों की बिक्री कम होती थी लेकिन अब बाजार में रौनक है और लोग खरीद रहे हैं। 

कोलकाता के चांदनी चौक में सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स का मार्केट है। यहां दुकान चलाने  वाले हरिओम साव ने बताया कि इस बार दीपावली पर लोग बहुत कम चाइनीज लड़ियों को खरीद रहे हैं। हर साल जिस बड़े पैमाने पर बिक्री होती थी वह नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि दीपावली से करीब 10 दिन पहले से ही प्रतिदिन 1000 से 1500 रुपये की लड़ियां बिक जाती थीं लेकिन अब बमुश्किल 300 से ₹500 रुपये की लड़ियां बिकती हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस बार दीपावली पर लोग जागरूक हुए हैं और मिट्टी के दीयों की तरफ बढ़ रहे हैं। 

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