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प्रवासियों का दर्द

बेगूसराय। देश के विभिन्न शहरों से प्रवासी श्रमिकों के आने का सिलसिला लगातार जारी है। घर पहुंचते ही इन प्रवासियों की जान में जान आ रही है। उन्हें लगता है कि एक लंबी जंग जीतकर, वह वापस लौटे हैं। ऐसा हो भी क्यों न, जब मार्च में हुए लॉकडाउन के बाद से ही वह सब देश के बड़े-बड़े शहरों में फंसे हुए थे।

सरकार की घोषणा और धरातलीय सच्चाई से रूबरू होने वाले यह श्रमिक, महानगरों के वैचारिक सोच की पोल खोल रहे हैं। इनकी कहानी बताती है कि महानगरों की हालत गांव से भी कई गुना बदतर है, वहां किसी को किसी से मतलब नहीं है।

लोग मतलब सिर्फ अपने काम और आर्थिक लाभ के हिसाब से रखते हैं। महानगर को इन लोगों ने सजाया-संवारा, मालिक के घर की शोभा बढ़ाने में दिन रात लगे रहे, उद्योगपतियों के खजाने को बढ़ाने में अपना खून जलाया। जब कोरोना रुपी विपत्ति आई तो सभी अपने कहने वाले देखते ही देखते पराए हो गए। मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया, मकान मालिकों ने घर में रहने के लिए या तो बड़ी शर्त रख दी या जबरन घर से निकाल दिया। 

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पैदल चलने को हुए तो बॉर्डर पर धक्के खाए, दिल्ली की सरकार ने उन्हें पेंडुलम बना दिया। वह अपने गृह राज्य के नहीं रहे और ना ही जहां रह रहे थे उसने अपनाया। जिस मकान मालिक को प्रत्येक महीने की एक तारीख को चार साथी मिलकर छह हजार रुपया किराया देते थे, उसने अकेले से आठ हजार की डिमांड कर दी।

बाहर भोजन की तलाश में निकलते थे तो धक्के खाने पड़े। इन्हीं परेशानियों से जूझते हुए रोज श्रमिक प्रवासी अपने घर की ओर लौट रहे हैं और सुबह से रात तक सदर अस्पताल में जांच करने वालों की भीड़ लगी रहती है। कोरोना जांच करवाने के लिए दिल्ली से पहुंची श्रमिकों की टोली ने जो बताया वह व्यवस्था पर करारा तमाचा लगाता है। 

 

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