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बिहार : बारिश ने खोल दी प्रशासन की पोल पट्टी

पटना। बिहार में बाढ़ का आना कोई नई बात नहीं है। बिहार का शोक कहीं जाने वाली कोसी नदी अपनी मचलती धारा के कारण बदनाम है। यह कब किस तरफ करवट बदल ले कोई नहीं जानता? इसी तरह बागमती और बूढ़ी गंडक भी जब अपने रौद्र रूप में आती है तो फिर काल का विकराल रूप धारण कर लेती है।

बाढ़ का दर्द क्या होता है अगर जानना हो तो बिहारवासियों से पूछिये। साल दर साल आने वाला जल प्रलय उनकी नियति बन चुकी है और भाग्य को उजड़ते देखना मजबूरी। हालांकि इस बार बाढ़ और बारिश ने आम लोगों के साथ खास लोगों को भी अपनी चपेट में लिया। नतीजा, कोहराम मच गया है। दरअसल, यहां बात पटना में भारी बारिश और उससे हुई तबाही की जा रही है।

तीन नदियों सोन, पुनपुन और गंगा से घिरे पटना की स्थिति कटोरे जैसी है।

स्मार्ट सिटी बनने का ख्वाब पाले पटना का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह से फेल हो चुका है। शहर का कोई ऐसा इलाका नहीं जहां घुटने से लेकर गर्दन तक पानी न भरा हो। आम लोगों के आशियानों से लेकर नेताओं और अफसरों के घरों तक पानी ने एक समान कब्जा किया हुआ है। राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी व उनका परिवार खुद इस जल कर्फ्यू का शिकार होकर अपने बंगले में कैद रहा।

तीन दिनों बाद एनडीआरएफ की टीम ने उनका रेस्क्यू किया। हालांकि सुशील मोदी जितना भाग्यशाली हर पटनावासी नहीं है। बिना बिजली व पानी तथा खाने के दाने-दाने को मोहताज अधिकतर बाशिंदे अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाने को मजबूर हैं। उधर, अपनी अक्षमता स्वीकार करने के बजाय कोई हथिया नक्षत्र का ज्ञान दे रहा है तो कोई भारी बारिश को कसूरवार ठहरा रहा है।

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