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मिल सकती है संघर्ष और हिंसा से मुक्ति : संघ प्रमुख भागवत

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वेदों को समाज जीवन में फिर से प्रतिष्ठापित करने और तेजस्वी बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इससे दुनिया में संघर्ष और हिंसा का अंत होगा।

सरसंघचालक ने शुक्रवार को लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) में आयोजित ‘चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ’ में कहा कि भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि वेदों में ज्ञान और विज्ञान दोनों का सामवेश है। वेद समग्र धर्म को उजागर करते हैं जिसमें बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार के ज्ञान शामिल हैं। इसी कारण भारत में वेदों को धर्म का मूल बताया गया है तथा यह केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है।

भागवत ने कहा कि वेद असल में पूजा कर्मकांड तक ही सीमित नहीं बल्कि ये पूरे मानव जाति के जीवन का प्रश्न है। वेदों के पुनर्तेजस्वीकरण से सारे विश्व का कल्याण होगा और उसके लिए हम सबको समर्पण करना पड़ेगा। आज जो दुनिया को भौतिक ज्ञान प्राप्त है उसे संभालने के लिए जो आंतरिक ज्ञान चाहिए उसके अभाव में युद्ध हो रहे हैं, विनाश हो रहा है और पर्यावरण की हानि हो रही है। उस ज्ञान को पूर्णता देने वाला यह वेदज्ञान हमको फिर अपने परिश्रम से पुनर्जीवित करना पड़ेगा।

सरसंघचालक ने कहा कि वेदों के संबंध में सामान्य भावना है कि यह कोई पूजा से जुड़ा विषय है। वहीं थोड़ा जानने वालों को भी पता है कि भारतवर्ष में वेद का नित्य जीवन से संबंध है क्योंकि वेदों के संदर्भ से ही सब चलता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय विज्ञान का है। विज्ञान ज्ञानेन्द्रियों को दिखने वाली बाहरी बातें जानता है।

यह प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर कार्य करता है। वहीं वेदों का अर्थ भी है जानना। वेदों में यह भी है और इसको जो समझ नहीं आता वह भी है, जो है ज्ञान। ज्ञान अपने अंदर की खोज करता है और विज्ञान अपने बाहर की खोज करता है। दोनों को जानने की आवश्यकता होती है। वेदों में दोनों का सम्यक गुण होने के कारण वह समाज को जोड़ते हैं। समाज को जोड़ने वाला धर्म होता है और वेदों को धर्म का मूल कहा गया है। उन्होंने कहा कि विभिन्न संप्रदायों के संतों ने बताया है कि वेद असल में धर्ममूल कैसे हैं। शुद्ध वेद ज्ञान की परंपरा जो खत्म हो गई उसको फिर से तेजस्वी बनाना। हमारे पूर्वजों ने जो परिश्रमपूर्वक हमें ज्ञान प्राप्त करा दिया।

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